सात वर्षीय आराध्या दूसरी कक्षा में प्रवेश पा गयी। वह हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल आती है। पिछले दिनों तनख्वाह मिली, तो उसके पापा उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गये।
आराध्या ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया कि पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है। वे अभी इस साल काम आ जाएँगे।
अपने जूतों की बजाए उसने पापा को अपने दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा।
पापा ने सोचा, आराध्या अपने दादा से शायद बहुत प्यार करती है, इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रही है।
खैर आराध्या के पापा ने उसे कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुँचे। दुकानदार ने आराध्या के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली। पहन कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी, फिर भी आराध्या ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा।
पापा ने बेटी से कहा, "आराध्या बेटा, ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है, तो फिर और लम्बी क्यों?"
आराध्या ने कहा, "पापा, मुझे शर्ट स्कर्ट के अंदर ही डालनी होती है, इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा और यही शर्ट मुझे अगली क्लास में भी काम आ जाएगी। पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी ही पड़ी है, लेकिन छोटी होने की वजह से मैं उसे पहन नहीं पा रही।"
पापा खामोश रहे...
घर आते वक़्त उन्होंने बेटी से पूछा, "तुम्हे ये सब बातें कौन सिखाता है आराध्या।"
आराध्या बोली, "पापा, मैं अक्सर देखती हूँ कि कभी माँ अपनी साड़ी छोड़कर, तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर, हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पर पैसे खर्च कर दिया करते है। गली-मोहल्ले में सब लोग कहते हैं कि आप बहुत ईमानदार आदमी हैं और हमारे साथ वाले प्रदीप के पापा को सब लोग चोर, बेईमान, रिश्वतखोर और जाने क्या-क्या कहते है, जबकि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं।
जब सब लोग पापा आपकी तारीफ़ करते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मम्मी और दादा जी भी आपकी तारीफ करते है।
आराध्या ने आगे कहा "पापा, मैं चाहती हूँ कि मुझे कभी जीवन में नए कपड़े, नए जूते मिले या ना मिले, लेकिन कोई आपको चोर, बेईमान, रिश्वतखोर न कहे। मैं आपकी ताक़त बनना चाहती हूँ पापा... आपकी कमजोरी नहीं।"
बेटी की बात सुनकर पापा निरुतर हो गये।
आज उन्हें पहली बार उनकी ईमानदारी का इनाम मिला था। आज पहली बार उनकी आँखों में ख़ुशी, गर्व और सम्मान के आँसू थे।
दुनिया में सबसे बडा खूबसूरत इनाम अपने परिवार, अपने बच्चों की आँखों में स्वयं को एक हीरो की तरह देखना। हमारे बच्चे हमको अपना आदर्श मानते है, हमको प्यार और सम्मान देते है। इससे बडा इनाम हमारी मेहनत, लग्न का नहीं हो सकता है।
"मान और सम्मान पैसो से नहीं संस्कारो से मिलता है।"
"हृदय हमेशा सच बोलता है और सही मार्गदर्शन करता है लेकिन लालच और अहंकार हमें भटका देते हैं। अपने हृदय की अच्छाई को अपने कार्यों में भी प्रतिबिम्बित होने दें।"
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