एक बार, सूरज नाम का एक लड़का अपने अध्यापक के पास गया और पूछा, "सर, एक व्यक्ति को जीवन में कितने मित्रो की आवश्यकता होती है - सिर्फ एक या बहुत सारे?"
अध्यापक ने उत्तर दिया, "यह तो बहुत सरल सवाल है। यह तो तुम खुद ही जान जाओगे। आओ मेरे साथ।"
फिर अध्यापक छात्र को पास के एक बाग में ले गए। वहाँ उन्होंने एक सेब के पेड़ की ओर इशारा करते हुए सूरज से कहा, "तुम्हें तुम्हारा जवाब मिल जाएगा, लेकिन उससे पहले, क्या तुम मुझे उस पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से एक सेब लाकर दे सकते हो?"
सूरज ने पेड़ की ओर देखा और चेहरे पर स्पष्ट निराशा के साथ कहा, "सर, मैं दिल से आपके लिए एक सेब लाना चाहता हूँ, लेकिन उस सेब तक पहुँचना मेरे लिए बहुत कठिन है।"
"तो, तुम अपने दोस्तों से मदद क्यों नहीं माँग लेते?" अध्यापक ने हल्का सा सुझाव देते हुए कहा।
सूरज उत्साह के साथ दौड़कर अपने दोस्तों के पास गया। वह अपने एक दोस्त के पास पहुँचा और उससे मदद मांगी।
अब दोनों दोस्तों ने एक-एक कर एक-दूसरे के कंधों पर खड़े होने की कोशिश की, लेकिन फिर भी वे पेड़ की सबसे ऊपरी शाखा तक नहीं पहुँच सके।
जल्द ही, दोनों थक कर निराश हो गए। सूरज ने अपने अध्यापक की ओर देखा और कहा, "सर, मैं अभी भी उस शाखा तक नहीं पहुँच पाया हूँ। अब मुझे क्या करना चाहिए?"
अध्यापक ने उत्तर दिया, "बेटा, क्या तुम्हारे और मित्र नहीं हैं?"
एक नए जोश के साथ, सूरज उठा और अपने अन्य मित्रों को अपने साथ लाने के लिए चला गया।
पेड़ की उस ऊँची शाखा तक पहुँचने के अपने प्रयास में, सभी मित्र एक दूसरे के कंधों और पीठ पर खड़े होकर, विभिन्न प्रकार की मानव आकृतियाँ बनाने लगे।
लेकिन अफसोस! कोई भी उपाय काम नहीं आ रहा था। वह शाखा इतनी ऊँची थी कि उनके द्वारा बनाया गया "मानव पिरामिड" भी ढह गया।
सभी थक गए और अब वे पेड़ की उस शाखा तक पहुँचने की सभी उम्मीदें खो चुके थे।
यह देखकर, अध्यापक ने सूरज को वापस बुलाया और पूछा, "तो सूरज क्या तुम्हें अपना उत्तर मिल गया? क्या अब तुम समझ गए कि एक व्यक्ति को कितने मित्रों की ज़रूरत होती है?"
सूरज ने उत्तर दिया, "जी सर। एक व्यक्ति के बहुत सारे मित्र होने चाहिए ताकि वे एक साथ मिलकर किसी भी समस्या को हल करने का प्रयास कर सकें।"
अध्यापक ने अस्वीकृति में सिर हिलाया। चेहरे पर मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, "बेशक, आपके बहुत सारे मित्र होने चाहिए... ताकि उन सभी में से कम से कम एक तो इतना होशियार हो जो सीढ़ी लाने के बारे में सोच सके।"
मनुष्य की पहचान उसकी संगत से होती है। वह अपने आस-पास के लोगों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होता है। इसलिए हमें उन लोगों की संगति करनी चाहिए जो हमें अपनी सीमाओं के पार जाकर पहले से बेहतर बनने के लिए प्रेरित करें।
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