एक बार एक महान दार्शनिक बुद्ध के पास आए। उनके पास पूछने के लिए बहुत सारे प्रश्न थे। वह बुद्ध के पास आये और उनसे प्रश्न पूछने लगे।
बुद्ध ने उनकी बात सुनी और कहा, "क्या आप सच में जवाब चाहते हो? यदि आप वास्तव में जवाब चाहते हैं, तो क्या आप इसकी कीमत चुका सकते हैं?"
दार्शनिक ने उत्तर दिया, "मैं सारा जीवन उत्तर खोजता रहा। मुझे कई जवाब मिले लेकिन हर जवाब से फिर नए सवाल खड़े हो गए। आप क्या कीमत चाहते हैं? मैं पूरी कीमत चुकाने को तैयार हूँ। मैं बस इन सवालों के जवाब चाहता हूँ और इन सवालों के जवाब के साथ इस धरती को छोड़ना चाहता हूँ।"
बुद्ध ने कहा, " अच्छा, ज्यादातर लोग जवाब चाहते हैं लेकिन कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं। इसलिए मैंने आपसे पूछा था।
एक साल तक मौन में बैठना होगा! यह कीमत है। मेरे पास एक साल मौन में बैठो और जब एक साल बीत जाएंगा, तो मैं खुद आपको सवाल पूछने के लिए कहूँगा। उस समय आप जो कुछ भी सवाल पूछना चाहते हैं, पूछ लेना। मैं वादा करता हूँ कि मैं हर चीज का जवाब दूँगा, मैं आपके सभी संदेहों को दूर कर दूँगा।
लेकिन एक साल तक आपको पूरी तरह से शांत और मौन बैठना होगा। एक साल तक आप कोई सवाल मत पूछना। "
दार्शनिक सोच रहा था कि हाँ कहूँ या नहीं! उसने मन ही मन सोचा, "एक साल का समय लंबा है, क्या वह मेरे सवालों का जवाब दे पाएंगे?"
उन्होंने बुद्ध से पूछा, "क्या आप पूरा आश्वासन देते हैं कि आप एक साल बाद मेरे हर सवाल का जवाब देंगे?"
बुद्ध ने उत्तर दिया, " मैं पूर्ण आश्वासन देता हूँ। अगर आप पूछोगे, तो मैं जवाब जरूर दूँगा लेकिन अगर आप नहीं पूछोगे तो मैं किसको जवाब दूँगा?
उसी समय पास के पेड़ के नीचे ध्यान में बैठा एक शिष्य हँसने लगा, दार्शनिक ने बुद्ध से पूछा, "वह क्यों हँस रहा है?"
बुद्ध ने उत्तर दिया, "उससे जा कर के पूछे।"
दार्शनिक शिष्य के पास गया और उससे हँसने का कारण पूछा। शिष्य ने उत्तर दिया, " यदि आप कुछ पूछना चाहते हैं, तो अभी पूछें। उन्होने मेरे साथ भी ऐसा ही किया था। लेकिन मैं आपको यह कह सकता हूँ कि वे सच कह रहे है। एक साल बाद अगर आप पूछेंगे, तो वे जवाब जरूर देंगे लेकिन एक साल बाद पूछता कौन है?
मैं यहाँ एक साल से चुपचाप बैठा हूँ और अब वे मुझे बहुत कहते है कि पूछो भाई। एक साल चुप रहने के बाद कुछ पूछने को नहीं रहता, हर जवाब मिल जाता है। पूछना है तो अभी पूछो, नहीं तो एक साल बाद कुछ भी पूछने को नहीं बचेगा।
दार्शनिक उत्तर जानना चाहता था इसलिए वह बुद्ध के साथ वहीं रूक गया। वह रोज मौन बैठा रहता। वह समय का पहिया भी भूल गया क्योंकि जिसके विचार धीमे हो जाते हैं, वे समय के बारे में जागरूकता खो देते हैं।
लेकिन बुद्ध को ठीक समय याद था। जब एक साल पूरे हो गए, बुद्ध दार्शनिक के पास गए और कहा, "अब, आप कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। मैं हर बात का जवाब दूँगा जैसा मैंने वादा किया था। क्या आपके पास पूछने के लिए कुछ है?"
दार्शनिक हँसने लगा और बोला, "वह शिष्य ठीक कह रहा था। अब जब मैं यहाँ एक साल से बैठा हूँ। मेरे पास पूछने के लिए कुछ नहीं बचा है। आपकी कृपा से, मैं सभी जवाब पा चुका हूँ। "
जवाब दिए नहीं जाते बल्कि प्राप्त होते हैं। जवाब बाहर से नहीं भीतर से आते है।
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