कई वर्ष पूर्व का क़िस्सा है. नानी जी को कानपुर गंगा स्नान कराने ले गया था. रास्ते में उन्हें याद आया कि उनका पैत्रक गाँव वहीं मंधना के पास ही था।
ढूँढते हुऐ हम पहुँच गए गाँव। नानी को वह गाँव छोड़े 55-60 साल बीत चुके थे। नानी के भाई आदि कब के गाँव छोड़ दूसरी जगह बस चुके थे। नानी को जो अपना घर याद था वहाँ अब खंडहर था।
गाँव के बुजुर्गों से बात की तो उन्होंने नानी के बाबा जी के चचेरे भाई के एक ख़ानदान का ज़िक्र किया जो अभी भी वहीं रहते थे । अब ज़ाहिर सी बात है उनका इतनी दूर का रिश्ता नानी से भी नानी भी 55-60 साल बाद गाँव में थी, हम लोगों का तो ख़ैर दूर दूर तक कोई रिश्ता ही न था।
पहले तो हिचक हुई कि वापस लौट लें फिर सोचा यहाँ तक आए हैं तो मिल लेते हैं।
उन सज्जन के घर पहुँचे, ग़रीब ब्राह्मण कहना भी अतिशयोक्ति होगी,वह ग़रीब में भी महाग़रीब एकदम विपन्न स्थिति में थे। कच्चा घर ही तो था लेकिन घर टूटा फूटा। बाहर एक दुबला पतला सा छोटा बालक खेल रहा था, उसे बताया, अंदर से उसकी माँ निकली। माँ ने तुरंत बेटे को भेज पिता को बुलवाया।
ग़रीबी देख हमसे वहाँ रुका ना जा रहा था, मालूम था हमारी आवभगत इनका महीने का बजट बिगाड़ देगी, साथ ही नानी भी भावुक हो रही थीं, कभी वहाँ ज़मींदारी थी आज वंशज इस हालत में, बैक ग्राउंड में चल रहा था कि। इसी बीच बच्चा भाग कर गया था फिर वापस आया, खाने को गाँव वाली बर्फ़ी आई। खाई नहीं जा रही थीं कि जिस तरह से वह लेकर आया लग रहा था कि उधार लाया है, बिलकुल लिमिटेड क्वांटिटी में जैसे दुकानदार क्रोध में दे देते हैं हाथ में चार पीस कि पिता को बोलना शाम तक पैसे दे जाए वाले।
ख़ैर मिठाई खाई, चाय भी आई, नमकीन भी आई। इसी बीच फिर माँ लड़के से घर के अंदर कुछ बात कर रही थी, अबकी लड़का भागता हुआ गया तो हाथ में झोला था, झोले में कुछ था. जब चलने का वक्त आया तो माँ ने हमें, पत्नी को, मेरे बेटे को बीस - बीस रुपए दिए। तब समझ आया कि झोले में गेहूँ भर कर भेजा था स्थानीय दुकानदार को, उसे बेच कुछ रुपए मिले जो वह हमें दे रही थी। अपना अन्न बेच मान्य को दक्षिणा दी जा रही थी।
हमें काटो तो खून नहीं, मना करने से उनका अपमान होता फिर हमने उनके बच्चे को कुछ पैसे देना चाहे तो वह बिलकुल अफ़ेंड हो गए। आयु में वह बच्चा था, पर रिश्तेदारी के हिसाब से वह मामा टाइप का हुआ तो भांजा मामा को कैसे पैसे दे सकता है। चलते वक्त नानी की भी विदाई उन्होंने की।
यह होते हैं भारतीय संस्कार। दान की प्रवृत्ति. उन्हें और हमें दोनो को मालूम था हम जीवन में पहली और अंतिम बार मिल रहे हैं प्रैक्टिक्ली। वह चाहते तो पाँच मिनट बात कर ही विदा कर देते और हम इतने मात्र से ख़ुश हो जाते। लेकिन उन्होंने पूरा लड़की पक्ष का संस्कार निभाया, आदर सत्कार दान दक्षिणा दी। यही कहलाते हैं संस्कार। ग़रीबी चाहे जितनी हो लेकिन अच्छे संस्कार दिख ही जाते हैं।
अभी हाल ही में केन्या देश ने भारत को खाद्यान्न आदि भेजे। ना भारत के पास खाद्यान्न की कमी है ना केन्या के खाद्यान्न से भारत सेठ बन गया - यह केन्या को भी पता है और भारत को भी। केन्या ने हमारी मुसीबत के समय यह दान देकर हमारा हौसला बढ़ाया, बताया कि तुम अकेले नहीं हो, हम जिस भी हालत में हैं हम तुम्हारे साथ हैं. वैसे ही अभी कुछ समय पूर्व भारत ने विश्व के देशों को वैक्सीन दी थी। यह हमारा सिद्धांत था कहने का तरीक़ा था कि हम तुम्हारी मुसीबत में तुम्हारे साथ हैं। यह थे अच्छे कर्म जिसके जवाब में आज केन्या जैसे देश भी भारत के साथ खड़े हैं, ताक़त भर मदद कर रहे हैं।
केन्या और ऐसे सभी देश जिन्होंने इस मुसीबत के क्षण भारत की मदद की उन सभी को वंदन, हार्दिक अभिनंदन।
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