अचानक उन चारों को होटल में बैठा देखकर.... मोहन हड़बड़ा सा गया....।
अरे, ये ....ये तो मेरे स्कूल के दोस्त हैं.....।
राजू, किशन .....और जगदीश.... और वो ....वो ....आकाश है .....। ये सब यहाँ.......?
मिलूँ,क्या ......इन सबसे....?
नहीं मोहन...पागल है क्या .....? देख इन सबको .....।
वो सभी सूटबूट में हैं ....लगता है कामयाब आदमी बन गए हैं....? और तू ....तू ...यहाँ एक छोटे-से होटल में एक मामूली-सा वेटर ....। पहचानेंगे भी वो ....? और अगर पहचान भी लिया तो .....तो चारों तुझ पर हँसेंगे ....।
नहीं, मोहन .....नहीं.....!!
पर अब यहाँ ये हमारे होटल के कस्टमर हैं और मैं यहाँ का वेटर ....। तो आर्डर तो मुझे ही लेना.....और खाना भी मुझे ही परोसना होगा .....।
खैर ....!! मेरा काम है, और पापा कहते थे-कोई भी मेहनत वाला काम छोटा या शर्मिंदगी वाला नहीं होता ....।
आज लगभग 15 सालों बाद मोहन के स्कूल के चारों दोस्त उसके सामने थे.....।
मोहन ने चारों से ऑर्डर लिया और अपने काम को बख़ूबी अंज़ाम देते हुए खाना परोसने लगा .....।
चारों ने उसकी ओर देखा तक नहीं, लगभग सभी अपने-अपने मोबाइल फ़ोन पर व्यस्त थे ......।
पिता के आकस्मिक निधन के चलते मोहन अपनी दसवीं की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाया था.....।
मगर मोहन को लगा था, उसके जिगरी दोस्त उसे पहचान जाऐंगे, लेकिन उन्होंने उसे पहचानने का प्रयास भी नहीं किया....।
वे चारों खाना खा कर बिल चुका कर चले गये.....।
मोहन को लगा उन चारों ने शायद उसे पहचाना नहीं या उसकी गरीबी देखकर जानबूझ कर कोशिश नहीं की....।
उसने एक गहरी लंबी साँस ली और टेबल साफ करने लगा.....।
वो टिश्यू-पेपर उठाकर कचरे में डालने ही वाला था....कि उस पर कुछ लिखा हुआ-सा दिखा....।
ओह.....!! शायद उन्होंने उस पर कुछ जोड़-घटाया ...।
अचानक उसकी नज़र उस पर लिखे हुए शब्दों पर पड़ी....।
जिसपर लिखा था - "अबे साले! तू हमें खाना खिला रहा था तो तुझे क्या लगा?तुझे हम पहचानें नहीं....?
अबे, 15 साल क्या अगले जनम बाद भी मिलता तो तुझे पहचान लेते....।
तुझे टिप देने की हिम्मत हममें नहीं थी...।
देख हमने पास ही फैक्ट्री के लिये जगह खरीदी है....,
और अब हमारा इधर आना-जाना तो लगा ही रहेगा....।
आज तेरा इस होटल का आख़िरी दिन है....।
हमारे फैक्ट्री की कैंटीन कौन चलाएगा बे....?
तू चलायेगा ना.....।
अबे, तुझसे अच्छा पार्टनर और कहाँ मिलेगा....?
याद हैं न, स्कूल के दिनों में हम पाँचों एक-दूसरे का टिफ़िन खा जाते थे...।
आज के बाद रोटी भी मिल बाँटकर साथ-साथ खाएँगे.....।
मोहन की आखें भर आईं....।
उसने डबडबाई आँखों से आसमान की तरफ़ देखा और उस पेपर को होंठों से लगाकर करीने- से दिल के पास वाली जेब में रख लिया.....।
मेरे दोस्तो !! .....सच्चे दोस्त वही तो होते हैं...,
जो दोस्त की कमज़ोरी नहीं, सिर्फ़ दोस्त को देख कर ही खुश हो जाते हैं.........
अच्छे दोस्त किस्मत से मिलते हैं।
हमेशा अपने अच्छे दोस्तों की कद्र करें....।
"दोस्तो ! दोस्त सिर्फ ही वायदे नहीं करते, हर मोड़ पर अपनी यारी भी निभाते हैं.....।"
अपने दोस्तों के सम्पर्क मे रहिए, बातचीत करते रहिए। 😊
दिल को छु लिया 😍😍
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