महान रसायन शास्त्री आचार्य नागार्जुन को अपनी प्रयोगशाला के लिए दो सहायकों की आवश्यकता थी, कई युवक उनके पास आए और निवेदन किया किंतु कोई भी उम्मीदवार परीक्षा की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। आखिर आचार्य नागार्जुन निराश हो गए, आचार्य नागार्जुन के निराश होने का कारण यह था कि सहायक के पद के लिए उम्मीदवार रसायन शास्त्र का ज्ञान और अपने विषय से परिचित थे किंतु एक रसायन शास्त्री के लिए जो पवित्र ध्येय होता है उसका सभी में अभाव था। उम्मीदवारों में किसी को अपने परिवार को पालने की चिंता थी, किसी को रोजगार की,
तो किसी का अपना भविष्य उज्जवल बनाना था। इस प्रकार के सहायकों की नागार्जुन को आवश्यकता नहीं थी। उनके मन और विचार में कुछ और ही था ।सहायकों की आवश्यकता होते हुए भी निराश होकर उन्होंने सारा कार्य स्वयं ही करने का निश्चय किया ।
कुछ समय बाद दो युवक उनके पास प्रार्थना लेकर आए कि उन्हें सहायक नियुक्त कर लिया जाए। आचार्य नागार्जुन ने पहले तो उन्हें लौटा देना चाहा, लेकिन युवकों के अधिक आग्रह पर आचार्य ने दोनों युवकों को एक पदार्थ देकर दो दिन बाद उनका रसायन तैयार कर लाने के लिए कहा। दोनों युवक पदार्थ लेकर अपने अपने घर लौट आए। दो दिन बाद एक युवक रसायन तैयार करके सुबह-सुबह ही आचार्य के पास पहुंचा और रसायन का पात्र उन्हे देते हुए कहा "लीजिए आचार्य जी रसायन तैयार है"। रसायन का पात्र देखे बिना ही आचार्य नागार्जुन ने प्रश्न किया, तो क्या रसायन तैयार कर लिया तुमने ? रसायन का पात्र रखते हुए युवक ने कहा गुरुदेव तैयार कर लिया। आचार्य ने दूसरा प्रश्न किया रसायन तैयार करने में कोई कठिनाई तो नहीं हुई ना? युवक ने संकोच के साथ कहा कठिनाइयां तो बहुत आई आचार्य जी किंतु मैंने किसी भी कठिनाई की चिंता किए बिना अपना काम जारी रखा और रसायन तैयार कर ही लिया। यदि मैं कठिनाइयों में उलझ गया होता तो रसायन तैयार ही नहीं हो सकता था ।मेरे घर में माता-पिता बुखार से पीड़ित थे और छोटे भाई के कान में दर्द होने के कारण वह पीड़ा से कराहता ही रहा। लेकिन यह बातें मुझे विचलित नहीं कर सकी। तभी दूसरा युवक खाली हाथ वहां आ पहुंचा और क्षमा भाव से बोला आचार्य जी मैं क्षमा चाहता हूं रसायन तैयार नहीं हो सका क्योंकि यहां से जाते समय रास्ते में एक बूढ़ा बीमार व्यक्ति मिल गया था इस कारण मेरा समय उसकी सेवा में ही व्यतीत हो गया। आचार्य नागार्जुन ने पहले युवक से कहा तुम जा सकते हो मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं ।रसायन शास्त्री यदि पीड़ा से कराहते हुए प्राणी को छोड़ दें तो वह अपने शास्त्र में अपूर्ण है । तुममें ध्येय
की कमी है आचार्य नागार्जुन ने दूसरे युवक को ध्येय की पवित्रता के कारण अपना सहायक नियुक्त कर लिया।
*लक्ष्य प्राप्ति की दौड में,दूसरों को दिखाने के लिए अपनों को कभी न भूलें,मानवीयता को कभी भूलें नहीं।*
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