महाभारत का युद्ध होने के पश्चात श्रीकृष्ण भगवान द्वारिका जा रहे थे रास्ते में उन्हें उत्तक मुनि मिले। उन्होंने कहा मुनिवर में आप को वरदान देना चाहता हूं कोई वर मांग लें। मुनि बोले भगवान जब मुझे प्यास लगी हो तब पानी मिल जाए ऐसा वरदान दीजिए। श्रीकृष्ण भगवान वरदान देकर चले गए। एक बार उत्तक मुनि वन में घूम रहे थे वहां उन्हें बहुत तेज प्यास लगी, आसपास में बहुत खोज की, लेकिन पानी नहीं मिला। अतः श्रीकृष्ण भगवान को याद किया। तभी उधर से एक चांडाल आया और बोला शायद आपको प्यास लगी है, मेरे घड़े में पानी है यदि आप चाहें तो इसे स्वीकार कर सकते हैं। चांडाल का घड़ा और पानी स्वच्छ था लेकिन घड़ा और पानी चांडाल का होने कारण मुनि ने मना कर दिया। चांडाल तो वहां से चला गया लेकिन मुनि यह सोचने लगे कि श्रीकृष्ण भगवान का वरदान निष्फल क्यों गया। तभी श्रीकृष्ण भगवान वहां प्रकट हुऐ ,आपने जिस पानी को अस्वीकार किया वह चांडाल नहीं था बल्कि चांडाल के वेश में स्वयं इंद्रदेव आए थे आपको अमृत अमृत पान कराने के लिए। स्वयं इंद्रदेव आए थे मैंने इंद्रदेव को समझाया लेकिन उन्होंने कहा कि अमृत के अधिकारी केवल देव ही होते हैं अमृत को पहचानने की शक्ति भी मनुष्य में नहीं होती ।लेकिन आप के कहने पर मैं स्वयं उन्हीं के पास जाऊंगा और वास्तव में इंद्र के घड़े में जो अमृत था उसे आप पहचान नहीं सके। वस्तु देने वाला कोई भी हो लेकिन वस्तु कैसी है और किस भाव से वह दे रहा है उसे देखना चाहिए ।अपने हाथ में आया हुआ अमृत पान का अवसर खो दिया। श्रीकृष्ण की बात को सुनकर उत्तक मुनि को बहुत पश्चाताप हुआ। वे अच्छी तरह समझ गए कि वस्तु और उसको देने का भाव शुद्ध हो तो उसे ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें